रायगढ़ में JSW एनर्जी की जमीन और प्रस्तावित पावर प्लांट से जुड़ा विवाद

प्लांट नहीं लगा, फिर भी 200 एकड़ जमीन का मामला चर्चा में; JSW को लेकर उठे सवाल

रायगढ़ के पांच गांवों में प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए हुआ था भूमि अधिग्रहण, कंपनी पर कर्मचारियों के नाम से जमीन खरीदने के आरोप

रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में प्रस्तावित एक औद्योगिक परियोजना को लेकर जमीन से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में है। एक स्थानीय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जेएसडब्ल्यू एनर्जी के प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए पांच गांवों में बड़ी मात्रा में जमीन का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन बाद में परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके अलावा कंपनी से जुड़े तीन लोगों के नाम पर करीब 87.738 हेक्टेयर यानी लगभग 216 एकड़ कृषि भूमि सीधे खरीदे जाने का भी दावा किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, मामला रायगढ़ के पूर्वांचल क्षेत्र के कुकुर्दा, नावापारा, डुमरपाली, छुहीपाली और साल्हेओना गांवों से जुड़ा है। इन गांवों में पावर प्लांट लगाने के लिए उद्योग विभाग के माध्यम से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

205 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण का दावा

केलो प्रवाह की रिपोर्ट के मुताबिक, पांचों गांवों को मिलाकर करीब 205.122 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2011 के दौरान जमीन की गाइडलाइन दर अपेक्षाकृत कम होने के कारण किसानों को मिलने वाला मुआवजा भी कम रहा। रिपोर्ट का दावा है कि बाद में जेएसडब्ल्यू एनर्जी ने प्रस्तावित प्लांट के लिए जमीन का पजेशन नहीं लिया और परियोजना आगे नहीं बढ़ी।

रिपोर्ट के अनुसार, अधिग्रहित जमीन बाद में उद्योग विभाग के नाम दर्ज हो गई। इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि जिन किसानों की जमीन औद्योगिक परियोजना के लिए ली गई थी, उस परियोजना के नहीं लगने के बाद उस जमीन का भविष्य क्या होगा।

कर्मचारियों के नाम पर जमीन खरीदने का दावा

मामले का दूसरा पहलू सीधे खरीदी गई कृषि भूमि से जुड़ा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जेएसडब्ल्यू एनर्जी से जुड़े तीन लोगों—संजय राणा, विकास चंद्र दुबे और शैलेंद्र कुमार साहू—के नाम पर कुल 87.738 हेक्टेयर भूमि खरीदी गई। रिपोर्ट में अलग-अलग गांवों में इन जमीनों का खसरा-वार विवरण भी दिया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें साल्हेओना, कुकुर्दा, डुमरपाली, नावापारा और छुहीपाली की जमीन शामिल है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और जमीन के मौजूदा स्वामित्व व उपयोग की आधिकारिक स्थिति अलग से सत्यापित किया जाना जरूरी है।

जमीन की कीमत बढ़ने से बढ़ा विवाद

इस पूरे मामले में जमीन की वर्तमान कीमत भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिन जमीनों की खरीद पुराने समय में अपेक्षाकृत कम दरों पर हुई थी, उनकी बाजार कीमत अब काफी बढ़ चुकी है। इसी आधार पर भविष्य में भूमि अधिग्रहण या किसी अन्य प्रक्रिया की स्थिति में मुआवजे को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि उद्योग विभाग के लैंड बैंक में मौजूद भूमि को भविष्य में किसी अन्य औद्योगिक परियोजना के लिए आवंटित किया जा सकता है। दूसरी ओर, कर्मचारियों के नाम पर खरीदी गई जमीन के संबंध में भी अलग प्रक्रिया की संभावना जताई गई है।

किसानों की जमीन और औद्योगिक विकास पर सवाल

रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में जमीन अधिग्रहण हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहा है। एक तरफ सरकार और उद्योग रोजगार तथा विकास की जरूरतों का तर्क देते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रभावित किसानों के लिए जमीन उनकी आजीविका और भविष्य का आधार होती है।

ऐसे में किसी परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन पर परियोजना नहीं लगने की स्थिति में भूमि उपयोग, मुआवजा, पुनर्वास और जमीन के भविष्य को लेकर पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है।

इस मामले में सामने आए आरोपों और दावों पर संबंधित सरकारी विभाग तथा जेएसडब्ल्यू एनर्जी का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल यह मामला रायगढ़ में जमीन, औद्योगिक परियोजनाओं और किसानों के अधिकारों से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ले आया है।

नोट: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें लगाए गए आरोपों/दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी शामिल किया जाना चाहिए।

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