छत्तीसगढ़ में भरतमाला प्रोजेक्ट में बड़ी अनियमितता, जांच में दिखे करोड़ों के फर्जीवाड़े के तार

 

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छत्तीसगढ़ में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी भरतमाला सड़क परियोजना से जुड़ा एक बड़ा मामला अब गरमाया हुआ है। सरकारी अधिकारियों और बिचौलियों के मिलीजुली कोशिशों से करोड़ों रुपये की ऐसी गड़बड़ी सामने आई है, जिसने ज़मीन अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। अलग-अलग जिलों में फैला यह धोखाधड़ी का जाल फिलहाल जांच एजेंसियों की रडार पर है, और शुरुआती पड़ताल में तो यह आंकड़ा 100 करोड़ रुपये के पार का बताया जा रहा है।

भरतमाला प्रोजेक्ट क्या है?

बात अगर भरतमाला प्रोजेक्ट की करें, तो यह सरकार का एक बहुत बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान है, जिसके जरिए देश भर में सड़कों के जाल को मजबूत करना और अलग-अलग शहरों को आर्थिक गलियारों से जोड़ना है। छत्तीसगढ़ में भी इसके तहत कई हाईवे बन रहे हैं। इनमें रायपुर से विशाखापट्टनम तक जाने वाला कॉरिडोर अहम है। परियोजना तो विकास की कहानी लिख रही थी, लेकिन इसी बीच ज़मीन खरीद और मुआवज़ा बांटने की प्रक्रिया में इतनी बड़ी सेंध लगी है कि हर कोई हैरान है।

घोटाले की शुरुआती कहानी: कैसे हुआ खुलासा?

जांच एजेंसियों को जब यह मामला सौंपा गया, तो पता चला कि ज़मीन अधिग्रहण के नाम पर मुआवजा देने में भारी हेराफेरी हुई है। आरोप है कि कुछ अधिकारी, बिचौलिए और स्थानीय लोग मिलकर ऐसे फर्जी दस्तावेज़ तैयार करते थे, जिनमें ज़मीन को बंटवारे के नए-नए गणित दिखाए गए। कई बार तो पहले ही अधिग्रहीत ज़मीन को फिर से सरकार के सामने रखकर दोबारा मुआवजा वसूल लिया गया। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे कोई एक ही बीमारी का बिल बार-बर अस्पताल से जमा कर रहा हो।

लेकिन जांच जैसे-जैसे गहरी होती गई, चौंकाने वाले तथ्य बाहर आए। किसानों के हस्ताक्षर और खाली चेक लेकर उन्हें धोखा दिया गया। किसी को ज़्यादा फायदा दिखाकर तो किसी को डरा-धमकाकर उनसे ज़रूरी कागज़ात ले लिए गए। बदले में ये लोग किसानों के नाम पर मुआवजे की भारी रकम ऐंठ लेते थे और बीच में से अपना हिस्सा काटकर बाकी किसानों को दे देते थे। यानी, किसान तो स्वर्ग का सपना देख रहा था, लेकिन उसके हिस्से की ज़मीन और पैसा दोनों ही लुट गए।

कितना बड़ा है मामला?

फिलहाल यह साफ तौर पर कहना थोड़ा मुश्किल है कि कुल कितने रुपये का गबन हुआ है, लेकिन शुरुआती अंदाज़ा 30 करोड़ रुपये से कहीं ज़्यादा का है। कुछ सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि अगर पूरे नेटवर्क को खोलकर देखा जाए, तो यह आंकड़ा 100 करोड़ रुपये के पार भी हो सकता है। सबसे हैरानी वाली बात यह है कि यह घोटाला अकेले किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। रायपुर, महासमुंद और आसपास के तमाम इलाकों में ऐसी गड़बड़ियां सामने आई हैं, जहां ज़मीन खरीद प्रक्रिया में धोखाधड़ी की शिकायतें मिल रही हैं। यानी, नेटवर्क बहुत बड़ा है, और इसमें कई लोग शामिल नज़र आ रहे हैं।

किसकी-किसकी भूमिका है संदिग्ध?

मामले में फिलहाल सबसे ज़्यादा निगाहें कुछ सरकारी अधिकारियों और स्थानीय बिचौलियों पर टिकी हैं। कहा जा रहा है कि ज़मीन से जुड़े रिकॉर्ड का जो अधिकारी रखता है, उसी ने मिलीभगत से रिकॉर्ड में फेरबदल किया। एक तरफ ज़मीन की कीमत कम दिखाई गई, तो दूसरी ओर मुआवजे की रकम बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई। बिचौलियों ने दोनों पक्षों के बीच ऐसा गेम खेला कि न तो किसानों को सही कीमत मिली और न ही सरकार को सही ज़मीन। बस बीच में से बड़ा हिस्सा कटता चला गया।

पूछताछ में यह भी पता चला है कि कई किसानों से तो उनके खाली बैंक चेक और ज़मीन के कागज़ ले लिए गए थे। किसान समझ ही नहीं पाया कि उसके कागजातों से क्या-क्या खेल हो रहा है। जांच एजेंसियों को अब यह भी पता लगाना है कि कहीं इस पूरे प्रोसेस में ठेकेदारों या अन्य प्राइवेट पार्टियों का भी कोई हाथ तो नहीं है।

जांच एजेंसियों का रुख और अब तक की कार्रवाई

इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए अब इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने कमर कस ली है। कई ठिकानों पर छापेमारी की जा चुकी है, और संदिग्ध लोगों से लगातार पूछताछ की जा रही है। यहां तक कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इस मामले में दिलचस्पी दिखाते हुए कुछ ठिकानों पर छापे मारे हैं। अब तक कुछ अधिकारियों और दलालों के खिलाफ केस दर्ज किए जा चुके हैं, और एक बड़े राजस्व अधिकारी को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। कोर्ट ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कुछ आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। यानी अब कानूनी प्रक्रिया भी तेज़ गति से चल रही है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क का सिर्फ ऊपरी सतह ही खंगाल पाई हैं। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में एक-दो और गिरफ्तारियां हो सकती हैं, और हो सकता है कि कुछ और नए नाम भी सामने आएं। सरकार की ओर से भी संकेत दिए गए हैं कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर इस तरह के घोटाले होते क्यों हैं? क्या जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में इतनी छेद नहीं थे? या फिर कुछ अपने स्वार्थ के लिए ऐसे रास्ते निकाल ही लेते हैं?

भरतमाला प्रोजेक्ट जैसी महत्वपूर्ण योजना में करोड़ों रुपये के इस तरह के फर्जीवाड़े ने लोगों का भरोसा तोड़ा है। यह वही परियोजना थी, जो छत्तीसगढ़ को विकास की राह पर तेज़ी से ले जाने वाली थी, लेकिन जमीनी हकीकत में पारदर्शिता की कमी ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है। अब जरूरी है कि जांच एजेंसियां इस मामले की गहराई तक जाएं और जल्द से जल्द दोषियों को सजा दिलाएं। अगर समय रहते ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में ऐसे और भी घोटाले सामने आ सकते हैं, जिससे आम आदमी को भरोसा दिलाना मुश्किल हो जाएगा।

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