क्या ट्रंप सच में ईरान से पूरी जंग छेड़ देंगे? मेरा मानना है – नहीं, और ये हैं पक्के कारण

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आजकल हर कोई यही पूछ रहा है – क्या अमेरिका और ईरान के बीच पूरी जंग छिड़ जाएगी? खासकर तब जब ट्रंप ने ‘शासन बदलने’ तक की बात कह दी है। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो लगता है कि ट्रंप पूरा युद्ध नहीं छेड़ेंगे। और इसके पीछे छह बड़े कारण हैं। आइए, उन्हें सीधे-सीधे समझते हैं।

पहला कारण: यह युद्ध ‘ज़रूरी’ नहीं था, ‘चुना हुआ’ था

पहली और सबसे बड़ी बात – अमेरिका के पास युद्ध के अलावा भी कई रास्ते थे। कूटनीति (बातचीत) का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ था। साथ ही, ईरान पर लगातार बढ़ता आर्थिक दबाव (प्रतिबंध) भी अपना असर दिखा रहा था। हो सकता था कि कुछ ही सालों में यह दबाव ईरानी शासन को घुटने टेकने पर मजबूर कर देता। तो बिना युद्ध के भी मकसद हासिल किए जा सकते थे।

दूसरा कारण: यह ‘बचाव’ का युद्ध नहीं है, ‘पहल’ का है

यह समझना जरूरी है कि ईरान ने अमेरिका पर पहले हमला नहीं किया था। न ही वह कल या परसों अमेरिका पर परमाणु हमला करने वाला था। ईरान से जो भी खतरा था, वह धीरे-धीरे बढ़ रहा था, अचानक नहीं। यानी यह युद्ध कोई आपात स्थिति (Emergency) नहीं है, जहां बचने का कोई रास्ता न हो। अमेरिका ने इसे चुन लिया है – और इसलिए दुनिया भी इसे उतने गंभीरता से नहीं ले रही जितनी ‘बचाव वाली जंग’ को लिया जाता।

तीसरा कारण: बम गिराकर सरकार नहीं बदली जाती

ट्रंप का बड़ा लक्ष्य ईरान में ‘शासन बदलना’ है। लेकिन यह एक बड़ी भूल है कि बम गिराकर सरकार बदली जा सकती है। सरकार बदलने के लिए ज़मीन पर सेना उतारनी पड़ती है – एक लंबा, खूनी और महंगा युद्ध लड़ना पड़ता है। और ट्रंप ने ‘अमेरिकी सैनिकों को घर वापस लाने’ का वादा करके चुनाव जीता था। अब वह उन्हें एक नए मोर्चे पर नहीं भेजेंगे।

चौथा कारण: ईरान का शासन गाजा की तरह टिकाऊ है

हमास और गाजा ने दिखा दिया कि भारी बमबारी के बाद भी शासन ढहता नहीं है, बल्कि और सख्त हो जाता है। ईरान का यह शासन पिछले 45 साल से सत्ता में है। यह एक संस्था (Institution) बन चुका है, न कि सिर्फ कुछ लोगों का समूह। इसलिए इसे ढहाना इतना आसान नहीं है। भले ही खामेनेई (सुप्रीम लीडर) मारे जाएं, तो भी सेना (रिवोल्यूशनरी गार्ड) तुरंत अपना कोई और व्यक्ति आगे कर देगी।

पांचवां कारण: ‘एक मुखिया मारने’ वाली रणनीति (Decapitation) यहाँ काम नहीं करेगी

अमेरिका ने कई बार यह कोशिश की है – किसी एक नेता को मारकर पूरा सिस्टम ढहा देना। लेकिन ईरान में यह नहीं होगा। क्योंकि ईरानी नेतृत्व ने यह युद्ध आने से पहले ही अपना उत्तराधिकारी (Succession) तैयार कर रखा है। अगर खामेनेई कल चले गए, तो उनकी जगह लेने के लिए एक से अधिक लोग पहले से ही खड़े हैं।

छठा कारण: ज़मीन पर कोई ‘वैकल्पिक सरकार’ तैयार नहीं है

शासन बदलने का एक सूत्र है – पहले वहाँ का विपक्ष तैयार होना चाहिए। एक ‘प्रतीक्षारत सरकार’ होनी चाहिए, जो अमेरिकी सेना के साथ मिलकर काम करे। ईरान में ऐसा कोई दल नहीं है। विपक्ष बिखरा हुआ है, असंगठित है, न तो उनके बीच एकता है और न ही उनके पास लोगों का समर्थन है। अब आप उस खालीपन में जाकर किसके हाथ में सत्ता सौंपोगे?

तो आखिर क्या? – सीधी बात

ट्रंप ईरान के साथ पूर्ण पैमाने पर युद्ध इसलिए नहीं छेड़ेंगे, क्योंकि यह एक ऐसा युद्ध है जिसे जीता नहीं जा सकता। हाँ, वे कुछ और सीमित हमले कर सकते हैं (जैसे परमाणु सुविधाओं पर मिसाइलें गिराना), लेकिन ज़मीन पर सेना नहीं उतारेंगे। उनका नारा है “अमेरिकी जवानों को घर लाएँगे”, न कि “ईरान पर कब्ज़ा करेंगे”।

मतलब साफ है – ट्रंप बम गिरा सकते हैं, लेकिन पूरी जंग नहीं लड़ेंगे। क्योंकि उस जंग का कोई ‘विजेता’ नहीं होता, बस दोनों तरफ़ लाशों के ढेर लग जाते हैं।

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