नेपाल के हिमालयी गांव हुए खाली: ‘हिमालयन गोल्ड’ यारसागुंबा की तलाश में हजारों लोग पहाड़ों की ओर रवाना

Photo: Wikimedia Commons

 

4000 मीटर की ऊंचाई पर कीड़ाजड़ी की खोज, लाखों में बिकने वाली इस दुर्लभ जड़ी-बूटी के लिए पूरा गांव छोड़ रहे लोग


काठमांडू। नेपाल के उत्तरी हिमालयी क्षेत्रों में हर साल गर्मियों के आगमन के साथ एक अनोखा और दिलचस्प नज़ारा देखने को मिलता है। तिब्बत सीमा से सटे ऊंचे पहाड़ी जिलों के गांव इस समय लगभग पूरी तरह खाली हो चुके हैं। घरों पर ताले लटक रहे हैं, सड़कों पर सन्नाटा पसरा है और पूरी आबादी ऊंचे पहाड़ों की ओर निकल चुकी है।

दरअसल, यह पलायन किसी आपदा या संकट के कारण नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे कीमती प्राकृतिक जड़ी-बूटियों में से एक—यारसागुंबा—की तलाश के लिए हो रहा है। इसे आम भाषा में ‘कीड़ाजड़ी’ भी कहा जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर बिकती है।

क्या है यारसागुंबा?

यारसागुंबा (वैज्ञानिक नाम: Cordyceps Sinensis) एक दुर्लभ प्राकृतिक फंगस है, जो हिमालय के 3800 से 5000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। यह एक अनोखा जीव है, जो आधा कीड़ा और आधा फंगस होता है। यह जमीन के नीचे ‘घोस्ट मॉथ’ नामक कीड़े के लार्वा पर परजीवी के रूप में विकसित होता है।

इसी अनोखी संरचना और औषधीय गुणों के कारण इसे ‘हिमालयन गोल्ड’ और ‘हिमालयन वियाग्रा’ भी कहा जाता है। पारंपरिक चीनी और तिब्बती चिकित्सा पद्धति में इसका इस्तेमाल ताकत बढ़ाने और कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है।

गांवों से पहाड़ों तक का सफर

नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तरी जिलों के कई गांव ऐसे हैं जहां इस समय एक भी व्यक्ति नहीं बचा है। पुरुष, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग—सभी लोग यारसागुंबा की खोज में ऊंचे पहाड़ी घास के मैदानों की ओर चले गए हैं।

ये लोग लगभग 4000 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अस्थायी टेंट लगाकर रहते हैं। सुबह करीब 8 बजे ये अपने कैंप से निकलते हैं और दिनभर पहाड़ों में कीड़ाजड़ी की तलाश करते हैं। शाम 6 बजे के बाद ही ये वापस अपने टेंट में लौटते हैं।

सुरक्षा के लिए रखे जाते हैं चौकीदार

गांवों के पूरी तरह खाली हो जाने के कारण कई परिवार अपने घरों की सुरक्षा को लेकर भी सतर्क रहते हैं। इसके लिए वे निचले इलाकों से लोगों को काम पर रखते हैं, जिन्हें घरों की देखरेख के लिए छोड़ा जाता है।

इन चौकीदारों को करीब 20,000 नेपाली रुपये तक मासिक वेतन दिया जाता है। इससे यह साफ होता है कि यारसागुंबा की कमाई कितनी अधिक हो सकती है, जो लोग इतनी बड़ी रकम सिर्फ घर की सुरक्षा पर खर्च करने को तैयार हैं।

आर्थिक जीवनरेखा बना ‘हिमालयन गोल्ड’

नेपाल के इन दुर्गम इलाकों में रोजगार के सीमित साधन हैं। ऐसे में यारसागुंबा की खोज स्थानीय लोगों के लिए आय का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है। एक सीजन में कई परिवार लाखों रुपये तक कमा लेते हैं, जिससे उनका सालभर का खर्च निकल जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस जड़ी-बूटी की अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार बढ़ रही है, खासकर चीन और अन्य एशियाई देशों में। यही वजह है कि हर साल हजारों लोग इसे खोजने के लिए जोखिम भरे पहाड़ी इलाकों में पहुंचते हैं।

जोखिम भी कम नहीं

हालांकि, यारसागुंबा की खोज जितनी लाभदायक है, उतनी ही जोखिम भरी भी है। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी, खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनती हैं।

इसके अलावा, कई बार इस जड़ी-बूटी को लेकर स्थानीय लोगों के बीच विवाद और झड़पें भी हो जाती हैं। सरकार को भी इसके अवैध व्यापार और अत्यधिक दोहन को लेकर चिंता बनी रहती है।

पर्यावरण पर असर

विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि यारसागुंबा की अंधाधुंध खोज से पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। बड़ी संख्या में लोगों के पहाड़ों पर जाने से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा रहता है।

इसलिए नेपाल सरकार ने इसके संग्रह के लिए कुछ नियम और सीमाएं तय की हैं, ताकि इस दुर्लभ संसाधन का संरक्षण किया जा सके।

आगे की राह

यारसागुंबा नेपाल के पहाड़ी इलाकों की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है। हालांकि, इसके साथ जुड़े जोखिम और पर्यावरणीय चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आने वाले समय में सरकार और स्थानीय समुदायों को मिलकर ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे लोगों की आजीविका भी सुरक्षित रहे और इस अनमोल प्राकृतिक संपदा का संरक्षण भी हो सके।


कुल मिलाकर, ‘हिमालयन गोल्ड’ की तलाश में हर साल खाली होते ये गांव नेपाल की एक अनोखी परंपरा और आर्थिक हकीकत को बयां करते हैं, जहां जीवन और जोखिम के बीच संतुलन बनाकर लोग अपनी रोजी-रोटी की तलाश में निकल पड़ते हैं।

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