रायपुर में विकास परियोजनाओं की बढ़ती लागत: देरी का खेल पड़ा 110 करोड़ में भारी

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विकास कार्यों का एक अजीबोगरीब दौर चल रहा है। सुनने में भले अटपटा लगे, लेकिन सच ये है कि यहाँ कुछ बड़ी परियोजनाओं का काम इतना सुस्त रफ्तार से हुआ है कि अब वे सरकारी खजाने पर भारी बोझ बन चुकी हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती – वर्षों की देरी ने अब इन प्रोजेक्ट्स की लागत को आसमान छूने पर मजबूर कर दिया है। माना जा रहा है कि इन अधूरे प्रोजेक्ट्स का खर्च करीब 110 करोड़ रुपये तक बढ़ चुका है। चलिए, जानते हैं पूरा मामला।

स्काईवॉक हो या हॉस्टल, सब अधूरे

रायपुर के बीचोबीच बन रहे स्काईवॉक की बात करें, तो यह प्रोजेक्ट लोगों के लिए किसी अधूरे सपने जैसा हो गया है। जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब सोचा गया था कि इससे शहर के ट्रैफिक को सुगम बनाने में मदद मिलेगी और पैदल चलने वालों को राहत मिलेगी। लेकिन इतने साल बीत जाने के बाद भी यह स्काईवॉक अधूरा पड़ा है। कभी ठेकेदार बदलते हैं, कभी डिजाइन में बदलाव होता है, तो कभी बजट की दिक्कतें आ जाती हैं। यही नहीं, शहर के अलग-अलग हिस्सों में जो छात्रावास और सार्वजनिक केंद्र बनने थे, वे भी समय पर पूरे नहीं हो पाए। इन प्रोजेक्ट्स का मकसद छात्रों और जरूरतमंदों को उचित जगह देना था, पर देरी के चलते वे आज बुरी हालत में पड़े हैं।

देरी के पीछे कौन सी वजहें हैं?

अगर किसी प्रोजेक्ट में देरी हो, तो आमतौर पर लोग सरकार या प्रशासन को कोसने लगते हैं। यहाँ भी कमोबेश यही कहानी है, लेकिन कुछ कारण और भी गहरे हैं। असल में, रायपुर में इन परियोजनाओं के लेट होने की मुख्य वजहें हैं:

  • प्रशासनिक अड़चनें: एक फाइल से दूसरे विभाग में जाते-जाते महीने निकल जाते हैं। मंजूरी के चक्कर में प्रोजेक्ट का काम ठप रहता है।

  • ठेकेदारों की लापरवाही: कई ठेकेदारों ने समय पर काम नहीं किया, न ही उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई हुई। इससे उनकी हिम्मत और बढ़ गई।

  • बजट की अनियमितता: जब फंड ही समय पर नहीं आता, तो काम करने वाली एजेंसियां हाथ खड़े कर देती हैं। फिर मजदूर छोड़कर चले जाते हैं, मशीनरी बेकार पड़ी रहती है।

  • बीच में डिजाइन बदलना: कई बार प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद उसके डिजाइन या स्कोप में बदलाव कर दिए जाते हैं, जिससे न केवल समय बर्बाद होता है बल्कि खर्च भी बढ़ता है।

110 करोड़ का अतिरिक्त बोझ कैसे बना?

सबसे चौंकाने वाली बात तो ये है कि इन प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़कर अब 110 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गई है। सोचिए, जो प्रोजेक्ट 50 करोड़ में पूरे होते, वे अब 70 या 80 करोड़ में पूरे हो रहे हैं। ये अतिरिक्त रकम कहां से आई? निर्माण सामग्री की कीमतें बढ़ीं, मजदूरी बढ़ी, और खासकर इतने लंबे समय में रख-रखाव और सुरक्षा का खर्चा भी तो देना पड़ा। ये सब मिलाकर कुल लागत को बढ़ा दिया।

एक अधिकारी के मुताबिक, “अगर इन प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा कर लिया गया होता, तो ये बचत 110 करोड़ कहीं और विकास में इस्तेमाल हो सकती थी। लेकिन देरी ने सब बिगाड़ दिया।”

जनता और जवाबदेही का सवाल

लोगों का कहना है कि जब चुनाव आते हैं, तो सब बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन काम करने में किसी को दिलचस्पी नहीं है। स्काईवॉक अधूरा होने से आम आदमी को सड़क पार करते वक्त जान जोखिम में डालनी पड़ती है। छात्रावास तैयार न होने के कारण दूसरे शहरों से आने वाले छात्रों को निजी हॉस्टलों में मनमाना किराया देना पड़ रहा है।

खास बात यह है कि अभी तक किसी अधिकारी या ठेकेदार पर सख्त कार्रवाई की बात सामने नहीं आई है। लोग पूछ रहे हैं – आखिर इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या किसी ठेकेदार का ब्लैकलिस्ट किया गया? प्रशासन के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है।

क्या अब सुधरेगा हाल?

हाल ही में प्रशासन ने ढोल बजाते हुए कहा है कि अब इन प्रोजेक्ट्स को तेज गति से पूरा किया जाएगा। बैठकें हो रही हैं, नए डेडलाइन तय हो रहे हैं। लेकिन जनता का मूड कुछ ज्यादा उदार नहीं है। उन्होंने बार-बार यह ड्रामा देखा है – पहले भी तय डेडलाइन बीत चुकी हैं।

यह कहना जरूरी है कि बिना सख्त निगरानी, मासिक रिपोर्टिंग और पब्लिक की सीधी नजर के बिना ये प्रोजेक्ट्स बार-बार लेट होंगे। अगर सरकार या नगर निगम ठेकेदारों के साथ मुलायम रवैया अपनाएगा, तो जनता का पैसा यूं ही जाता रहेगा।

समझ लीजिए सबक

रायपुर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि विकास सिर्फ योजना बनाने से नहीं, उसे समय पर पूरा करने से होता है। 110 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ एक कड़वा सच है – यह बता रहा है कि देरी कितनी महंगी पड़ सकती है। अब चाहे स्काईवॉक का कर्तव्य हो या हॉस्टल निर्माण, हर प्रोजेक्ट को समय का पाबंद बनाना होगा। वरना, आने वाले सालों में जनता का गुस्सा सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि थानों और कोर्ट तक पहुंच जाएगा।

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