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Supreme Court on Women Job: ‘क्या महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?’ IOCL को ₹12 लाख मुआवजे का आदेश

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक भेदभाव से जुड़े एक अहम मामले में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) को एक महिला को ₹12 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है। महिला ने LPG बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था, लेकिन आरोप था कि उसे केवल महिला होने के कारण नौकरी नहीं दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि किसी महिला को सिर्फ उसके लिंग के आधार पर शारीरिक मेहनत वाले काम से दूर रखना समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है।

यह मामला सुमित्रा बनाम इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड, SLP (C) No. 19874/2026 से जुड़ा है। मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की। चूंकि याचिकाकर्ता अब सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी हैं और उन्होंने अपने अधिकार के लिए लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी, इसलिए अदालत ने नियुक्ति के बजाय एकमुश्त मुआवजा देने का फैसला किया।

‘सिर्फ महिला होने के कारण नौकरी क्यों नहीं दी?’

सुनवाई के दौरान IOCL की ओर से यह दलील दी गई कि रिफिलिंग हेल्पर का काम शारीरिक मेहनत वाला है। इसमें LPG सिलेंडर उठाने के साथ-साथ नाइट शिफ्ट में काम करना भी शामिल हो सकता है। कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि उम्मीदवारों की सूची केवल सिफारिश थी और नियुक्ति के लिए बाध्यकारी नहीं थी।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर महिला को केवल महिला होने के कारण नियुक्त नहीं किया गया, तो ऐसा क्यों किया गया। जस्टिस अरविंद कुमार ने इसे महिला की गरिमा और समान अवसर के अधिकार के खिलाफ बताया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि महिलाएं अपने घरों में नियमित रूप से LPG सिलेंडर उठाती और बदलती हैं, इसलिए केवल महिला होने के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं है कि वह ऐसा काम नहीं कर सकती।

49 लोगों की सूची में शामिल थीं सुमित्रा

मामले के अनुसार, पंजाब के गुढ़ा गांव की रहने वाली सुमित्रा उन 49 लोगों में शामिल थीं, जिनके नाम डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली स्थानीय समिति ने IOCL के LPG बॉटलिंग प्लांट में रोजगार के लिए सुझाए थे।

सुमित्रा ने कैजुअल खलासी, चपरासी या रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था। लेकिन उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं मिला, जबकि सूची में शामिल 43 अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए।

इसके बाद सुमित्रा ने अदालत का रुख किया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि वह निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं। अदालत के सामने एक बचाव पक्ष के गवाह की गवाही भी आई, जिससे यह संकेत मिला कि महिला होने के कारण उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई थी। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें कैजुअल कर्मचारी, प्रशासनिक पद या चपरासी जैसे पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था।

पहले अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत

ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद मामला प्रथम अपीलीय अदालत में गया। वहां ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया गया। अपीलीय अदालत ने कहा कि सुमित्रा का नाम केवल सिफारिश सूची में था और उनका अंतिम चयन नहीं हुआ था।

इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। 14 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने भी प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट के अनुसार केवल सिफारिश किए जाने से नियुक्ति का कोई कानूनी या निहित अधिकार पैदा नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी के बजाय ₹12 लाख मुआवजा क्यों दिया?

सुप्रीम कोर्ट के सामने जब मामला आया, तब तक सुमित्रा सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच चुकी थीं। ऐसे में इतने वर्षों बाद उन्हें उसी नौकरी पर नियुक्त करना व्यावहारिक नहीं था।

अदालत ने इस लंबे कानूनी संघर्ष और कथित लैंगिक भेदभाव को ध्यान में रखते हुए ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देना उचित माना। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि महिला ने अपने अधिकार के लिए वर्षों तक कानूनी लड़ाई जारी रखी।

महिलाओं के काम को लेकर बनी धारणा पर अदालत की टिप्पणी

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल मुआवजे की रकम नहीं, बल्कि अदालत की वह टिप्पणी है जिसमें महिलाओं की शारीरिक क्षमता को लेकर बनी लैंगिक धारणाओं पर सवाल उठाया गया।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी काम को पुरुषों के लिए उपयुक्त और महिलाओं के लिए अनुपयुक्त मान लेना अपने आप में नियुक्ति का उचित आधार नहीं हो सकता। यदि किसी पद के लिए शारीरिक क्षमता, तकनीकी योग्यता या अन्य विशेष मानक निर्धारित हैं, तो उम्मीदवार का आकलन व्यक्तिगत योग्यता और निर्धारित मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल उसके लिंग के आधार पर।

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए भी अहम संदेश

IOCL एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया के लिए भी महत्वपूर्ण है।

इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि रोजगार के अवसरों में महिला और पुरुष उम्मीदवारों के बीच अंतर केवल लिंग के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। किसी पद की वास्तविक आवश्यकताओं और उम्मीदवार की योग्यता के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

सुमित्रा का मामला एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने उनकी उम्र और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए नौकरी देने के बजाय ₹12 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही सुनवाई के दौरान महिलाओं को शारीरिक मेहनत वाले कामों के लिए कम सक्षम मानने वाली सोच पर कड़ी टिप्पणी की।

फैसले का अहम पहलू यही है कि महिला होना अपने आप में किसी नौकरी के लिए अयोग्यता का आधार नहीं हो सकता। उम्मीदवार की क्षमता और पद की वास्तविक आवश्यकताओं को आधार बनाया जाना चाहिए।

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